टोंक। श्री पाश्र्वनाथ पंच कल्याणक समिति द्वारा सकल दिगम्बर जैन समाज के सहयोग से आयोजित श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक महा महोत्सव के चौथे दिन केवलज्ञान कल्याणक पर आयोजित धर्म सभा में वात्सल्य वारिधि राष्ट्र गौरव आचार्य  वर्धमान सागर  ने कहा कि तीर्थंकर भगवान को आहार की जरूरत नहीं होती है, फिर भी तीर्थंकर भगवान आहार के माध्यम से भविष्य का संविधान बनाते हैं कि मुनिराज किस प्रकार आहार करेंगे वे किस विधि से आहार लेंगे।  पाश्र्वनाथ भगवान को केवलज्ञान होने पर धर्मतीर्थ का प्रवर्तन स्थान स्थान पर समवशरण में धर्म देशना दी। आचार्य वर्धमान सागर जी ने समवशरण में मुनिराज श्रावक श्राविकाओं की जिज्ञासा  का आगम  सम्मत समाधान प्रवचन माध्यम से  किया । श्राविका नारी पर्याय से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है, इसके उत्तर में आचार्य ने कहा कि सम्यक दर्शन, ज्ञान चरित्र जो धर्म है, उसका समीचीन पालन करके आप नारी पर्याय से छुटकारा पा सकते हैं । प्रवचन के दौरान एक श्रावक ने प्रश्न किया कि सर्वश्रेष्ठ गति कौन सी है तो आचार्य ने कहा कि मनुष्य गति ही श्रेष्ठ है, क्योंकि इससे आप संयम धारण करके  मोक्ष की प्राप्ति कर सकते हैं। वर्ष 2026को वात्सल्य वारिधि आचार्य वर्धमान सागर का चातुर्मास किस नगर में होने संबंधी  प्रश्न पर आचार्य ने उत्तर देते हुए कहा कि चातुर्मास स्थापना की नियत तिथि को संघ जिस नगर में होगा वहा चातुर्मास स्थापित करेंगे। इसके पूर्व के प्रवचन हुए श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा प्राण महामहोत्सव के चौथे कल्याणक के पांचवें दिन विमान शुद्धि कलश यात्रा निकाली गई। संहितासूरि पंडित हंसमुख जैन धरियावद, प्रतिष्ठाचार्य  मनोज कुमार के निर्देशन में  महा यज्ञ नायक सहित सभी इंद्र द्वारा मंदिर वेदी वास्तु व हवन का आयोजन किया गया। वात्सल्य वारिधि आचार्य वर्धमान सागर महाराज ससंघ के  मौजूदगी में केवलज्ञान संस्कार क्रिया, अधिवासना, मुखोद्घाटन, नयनोन्मिलन, सूरीमंत्र, गुणारोपण, केवल ज्ञान पूजा, हवन, पद्दोद्घाटन, समवसरण दर्शन व 46 दीप से आरती, दिव्य ध्वनि का आयोजन किया गया। इस दौरान हजारों जैन समाज के लोगों ने  भगवान पाश्र्वनाथ एवं  आचार्य वर्धमान सागर महाराज के जयकारों से पांडाल को गूंजा दिया। वात्सल्य वारिधि आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज ससंघ के सानिध्य । आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज के सान्निध्य में दीप प्रज्वलन व चित्र अनावरण  तथा आचार्य के चरण प्रक्षालन एवं जिनवाणी भेट  पुण्यार्जक  परिवारों द्वारा किए गए। सांयकालीन आरती करने के सौभाग्यशाली  परिवार के लोग वर्धमान सभागार पहुंचे जहां पर श्रीजी की महाआरती की गई। शास्त्र सभा के बाद सांस्कृतिक का आयोजन किया गया । इसके पूर्व सुबह 10 बजे दीक्षा लेने के चार दिन बाद  पाश्र्वनाथ महा मुनिराज आहार पर निकलते हैं। आचार्य वर्धमान  सागर सहित संपूर्ण संघ की उपस्थिति में महा मुनिराज के आहार का सौभाग्य धनदत्त श्रेष्ठी के रूप में विमला देवी, गंभीरमल, पदम, अतुल कासलीवाल परिवार के बाद प्रतिमा धारी श्रावक श्राविकाओं के बाद संघ के आहार दाताओं को प्राप्त हुआ। अनेक श्रावक, श्राविकाओं को आहार देने का सौभाग्य मिला। इस अवसर देवकृत रत्नवर्षा, पुष्पवर्षा, गंधोदक वृष्टि, शीतल मंद सुगंधित वायु प्रवाह, दुंदुभी बाजे पंचाश्चर्य होते है। पंच कल्याणक समिति की विभिन्न व्यवस्थाओं के सेवाभावी कार्यकर्ताओं का स्वागत  पंच कल्याणक कमेटी ने किया। तीर्थंकर मुनिराज को दीक्षा लेते ही मनपर्यय  ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । केवलज्ञान रूप उदित होने पर केवलज्ञान के दस अतिशय प्रकट होते हैं। केवलज्ञान होते ही सौधर्मइंद्र कुबेर को आज्ञा देते हैं कि भगवान के समवशरण की रचना की जाए। स्वर्ण रत्न आदि दिव्य विभूतियों से 8 भूमियों में निर्मित 12 सभाओं से शोभायमान अष्ट प्रतिहार्य से युक्त समवशरण में भगवान अत्यंत मनोज्ञ प्रतीत होते हैं।

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