टोंक(संवाददाता:कजोड गुर्जर) | टोंक ज़िले से एक बार फिर सार्वजनिक निर्माण विभाग की लापरवाही उजागर हुई है। जौंला गांव में पुलिया का निर्माण महीनों पहले शुरू तो कर दिया गया, लेकिन आज तक अधूरा ही पड़ा है। निर्माण कार्य को बिना पूरा किए ठेकेदार मौके से भाग निकला और अब यह अधूरी पुलिया गांव वालों के लिए मुसीबत बन चुकी है। रोजाना लोग इसी रास्ते से गुजरने को मजबूर हैं और आए दिन चोटिल हो रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार अब तक दर्जन से अधिक लोग इस अधूरे निर्माण के कारण घायल होकर अस्पताल पहुँच चुके हैं।
यह मामला सिर्फ लापरवाही का ही नहीं बल्कि विभागीय भ्रष्टाचार का भी प्रतीत होता है। ग्रामीणों का साफ आरोप है कि अधिकारियों और ठेकेदार की मिलीभगत से ऐसा घटिया व अधूरा निर्माण हुआ है, जिसका उद्देश्य सिर्फ पैसे की बंदरबांट है, जनता की सुविधा नहीं। पुलिया तक जाने वाले रास्ते में बड़े-बड़े गड्ढे पड़े हैं, साइड की सुरक्षा दीवारें नहीं बनी, सीमेंट-पत्थर की परतें जगह-जगह से उखड़ रही हैं और पानी निकासी की उचित व्यवस्था तक यहां नहीं है।
दिखावा हुआ पूरा, काम अधूरा — सवालों के घेरे में विभाग
जानकारी के अनुसार इस पुलिया का निर्माण जौंला को आसपास के गांवों से जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण माना गया था। इसके अधूरे रहने से गांव वालों को खेत-खलिहान, बाजार, स्कूल और अस्पताल तक आने-जाने में भारी परेशानी उठानी पड़ रही है। बरसात के दौरान स्थिति और भयावह हो गई थी। कई बार तेज बहाव में लोग फिसलकर गिर चुके हैं। ग्रामीणों का कहना है कि शिकायतें तो कई बार दर्ज करवाई गईं, लेकिन विभाग ने आंखें मूंद रखी हैं।
विभागीय अधिकारियों द्वारा न तो उचित निरीक्षण किया गया और न ही ठेकेदार पर कोई जिम्मेदारी तय की गई। सवाल यह उठ रहा है कि जब निर्माण कार्य में खामियाँ थीं, तो निरीक्षण रिपोर्ट में इन्हें क्यों नज़रअंदाज़ किया गया? आखिर किसके निर्देश पर ठेकेदार को भुगतान कर दिया गया? और उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा?
ग्रामीणों का फूटा गुस्सा — चेतावनी “कार्य नहीं हुआ तो बड़ा आंदोलन”
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पुलिया को लेकर आश्वासन तो बहुत दिए गए, लेकिन काम आज तक नहीं हुआ। इसी से ग्रामीणों में भारी आक्रोश बढ़ता जा रहा है। गांव के बुजुर्गों और युवाओं ने पंचायत स्तर पर बैठक कर चेतावनी दी है कि यदि जल्द निर्माण पूरा नहीं कराया गया तो वे बड़े आंदोलन की राह पकड़ेंगे।
गांव के कई युवाओं ने कहा कि यह सिर्फ निर्माण कार्य का नहीं, प्रशासन की संवेदनहीनता का मुद्दा है। गांव के लोग रोज जोखिम उठाकर इस अधूरी पुलिया को पार करते हैं। दुर्घटना में किसी की जान चली जाए तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? विभाग, ठेकेदार या प्रशासन?
जिम्मेदार कौन? जवाब मांग रहा जौंला गांव
पुलिया के ढांचे को देखते ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह काम मानकों को ताक पर रखकर किया गया है। ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि घटिया सामग्री का इस्तेमाल कर आर्थिक गड़बड़ी की गई है। काम के दौरान कोई निगरानी नहीं की गई। निर्माण धीमी गति से चलता रहा और अचानक से बंद हो गया।
गांव के एक किसान ने कहा —
“हमारे टैक्स के पैसों से विकास होना चाहिए था, लेकिन इस पुलिया ने तो हमारे सामने भ्रष्टाचार की पोल खोल दी। अधिकारी सिर्फ कागज़ों में जांच कर अपनी खानापूर्ति कर लेते हैं। असली समस्या हम भुगत रहे हैं।”
इस घटना से क्षेत्र में यह चर्चा गर्म है कि कहीं PWD ने कागज़ों में इसे पूरा दिखाकर फाइल बंद तो नहीं कर दी? अगर ऐसा है तो यह सीधा-सीधा भ्रष्टाचार का मामला होगा।
लोकल जनप्रतिनिधियों पर भी सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि प्रतिनिधि चुनाव के समय तो गाँव-गाँव घूमकर विकास के वादे करते हैं, लेकिन अब खामोश हैं। किसी भी अधिकारी या नेता ने अभी तक मौके पर पहुँचकर स्थिति का जायज़ा नहीं लिया है।
ग्रामीण संघ के सदस्यों का कहना है कि यह मामला जिला प्रशासन के समक्ष उठाया जाएगा और आवश्यक कार्रवाई तक आंदोलन जारी रहेगा।
प्रशासन व विभाग की चुप्पी — बढ़ती शंका
दर्दनाक बात यह है कि दर्जनों लोग घायल होने और रोज़ाना हादसे होने के बावजूद विभागीय अधिकारियों ने ठोस कदम नहीं उठाए। न ही किसी अधिकारी ने इसका जवाब देना उचित समझा। विभाग की चुप्पी यह संकेत दे रही है कि या तो इस प्रकरण की गंभीरता को जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, या फिर कहीं न कहीं दाल में काला ज़रूर है।
जौंला की आवाज़ — “हमें पुलिया चाहिए, समस्या नहीं”
गाँव के लोगों की मांग स्पष्ट है —
निर्माण कार्य को तुरंत प्रारंभ किया जाए
घटिया सामग्री का प्रयोग करने वाले ठेकेदार पर कार्रवाई हो
दोषी अधिकारियों की जांच कर जवाबदेही तय हो
एक सुरक्षित और मानक अनुसार पुलिया जल्द से जल्द बनकर तैयार हो
जब तक कार्य पूरा नहीं होता, तब तक ग्रामीण संघर्ष जारी रखने के मूड में हैं।

