विभाजन के समय जब पाकिस्तान में 20 लाख हिंदुओं का कत्ल हुआ, तब सिंधी-हिंदू बड़ी संख्या में अजमेर आए। इन्हीं में भाऊ प्रभुदास और छोटे भाई परमानंद भी थे।
डॉक्टर हेडगेवार जी का चित्र भी साथ लाए।
आपातकाल में दोनों भाइयों को जेल भी जाना पड़ा।
अजमेर में पिता आतुमल जी ने चतुर्थ श्रेणी की नौकरी की तो भाईयों ने शरणार्थी शिविर में एक रुपए में 16 कपड़े सीये।
अजमेर {संवाददाता:एस.पी.मित्तल(ब्लॉगर)}|1947 में देश के विभाजन के समय जब मुस्लिम बाहुल्य प्रांतों में हिन्दुओं के कत्लेआम हो रहा था, तब सिंध प्रांत में हिंदुओं की जान खतरे में थी। माना जाता है कि तब 20 लाख हिंदुओं का कत्लेआम हुआ। लाखों हिंदू जान बचाकर किसी तरह भारत आए। तब पाकिस्तान के सिंध प्रांत से बड़ी संख्या में सिंधी हिंदू अजमेर आए। इन्हीं सिंधी हिंदू परिवारों में आतुमल जी का परिवार भी शामिल था। आतुमल अपने दोनों बेटे प्रभुदास और परमानंद के साथ अजमेर आए। आतुमल अपना सब कुछ सिंध के सख्खर शहर में छोड़कर आए। आतुमल ने तब नगर परिषद में चतुर्थ श्रेणी पद की नौकरी की और दोनों पुत्रों को शरणार्थी शिविर में कपड़े सीने का काम करना पड़ा। अजमेर में तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सिंध से आए सिंधी हिंदुओं के लिए विशेष सुविधाएं जुटाई गई। प्रभुदास और परमानंद दोनों भाइयों से संघ के कार्यकर्ताओं को बताया कि वे सिंध के सख्खर शहर में संघ की शाखा में जाते थे। असल में 1947 में देश के विभाजन के फैसले से पहले संपूर्ण भारत देश में संघ की शाखाएं शुरू हो गई थी। अजमेर आने के बाद प्रभुदास ने बताया कि जब वे अपने घर को छोड़कर कई किलोमीटर दूर आ गए थे, तब उन्हें याद आया कि डॉक्टर हेडगेवार जी (संघ के संस्थापक केशव राव बलिराम हेडगेवार) का चित्र रह गया है। अपनी जान जोखिम में डालकर प्रभुदास घर आए और डॉ. हेडगेवार का चित्र लाए। प्रभुदास का मानना रहा कि वह नहीं चाहते थे कि डॉक्टर जी का चित्र विधर्मियों के हाथ लगे। चूंकि दोनों भाई देश के विभाजन से पहले ही स्वयंसेवक रहे इसलिए अजमेर में भी संघ की शाखाओं में जाना शुरू कर दिया। हालांकि अब दोनों भाइयों का निधन हो चुका है, लेकिन अजमेर में भी दोनों भाइयों ने अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। शरणार्थी शिविर में रहकर एक रुपए में 16 कपड़े सीये, ताकि घर में दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके। अजमेर में ऐसे अनेक सिंधी हिंदू परिवार है, जिन्होंने कपड़े सीने के बाद आसमान की ऊंचाइयों वाली उपलब्धि प्राप्त की। शुरू में जिन्हें शरणार्थी कहा गया वे अपने पुरुषार्थ के बल पर आज अजमेर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैँ। असल में सिंधी हिंदू ये लोग शरणार्थी नहीं बल्कि पुरुषार्थी बनकर अजमेर आए और फिर अजमेर में अपना मुकाम बनाया। दोनों भाइयों का कहना रहा कि वे जब वह अपने पिता के साथ सिंध के सख्खर में रह रहे थे, तब देश के विभाजन की कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन जब तब के नेताओं ने विभाजन का फैसला स्वीकार किया तो सिंध में रहने वाले हिंदुओं का कत्लेआम शुरू हो गया। भाऊ प्रभुदास 80 वर्ष की उम्र में भी संघ की शाखा में जाते रहे। तीन बार हड्डी टूटने के बाद भी संघ की शाखा में जाना नहीं छोड़ा। समय के बदलाव के साथ भाऊ प्रभुदास और भाऊ परमानंद ने नया बाजार में कपड़े की दुकान खेली। यह दोनों भाई वर्षों तक स्वयंसेवकों की नेकर और शर्ट सिलने का काम करते रहे। संघ का स्वयंसेवक होने के नाते ही दोनों भाइयों को आपातकाल में जेल जाना पड़ा। यानी जिन प्रभुदास और परमानंद ने विभाजन का विभीषिका को अपनी आंखों से देखा। उन्हें ही आजादी के बाद जेल भी जाना पड़ा। दोनों भाइयों का कसूर सिर्फ इतना ही था कि वे संघ की शाखाओं में नियमित जाते थे। आपातकाल में देश भर में संघ के स्वयंसेवकों को जेलों में डाला गया। भाऊ प्रभुदास और भाऊ परमानंद को इस बात का अफसोस रहा कि तब की सरकार ने स्वयंसेवकों को ही देश विरोधी मान लिया, जबकि उन लोगों ने तो देश के विभाजन के समय हुए अत्याचार को झेला। भाऊ प्रभुदास ने संघ में अनेक दायित्वों का निर्वहन किया। वह नगर कार्यवाह, व्यवस्था प्रमुख भी रहे। संघ का कार्यकाल प्रतिदिन जाना उनके स्वभाव में था। नया बाजार की दुकान पर प्रात: 11 बजे इसलिए आते थे ताकि पहले संघ कार्यालय में उपस्थिति दर्ज करवा सके। भाऊ परमानंद भी मुख्य शिक्षक कार्यवाह, मंडल कार्यवाह नगर कार्यवाह आदि पदों पर रहे। भाऊ परमानंद के पौत्र कन्हैया मनवानी ने बताया कि उनके बड़े दादा भाऊ प्रभुदास के पुत्र रमेश मनवानी अजमेर के फॉयसागर रोड पर रहते हैं तथा दूसरे पुत्र ज्ञानजी सूरत में कारोबार कर रहे हैं। इसी प्रकार उनके दादा भाऊ परमानंद जी के एक पुत्र प्रताप जी गंज में तथा अशोक जी नया बाजार में कपड़े की दुकान चला रहे हैं। भाऊ प्रभुदास और भाऊ परमानंद जी के बारे में और अधिक जानकारी मोबाइल नंबर 9351519181 पर कन्हैया मनवानी से ली जा सकती है।
