टोंक(संवाददाता:अशोक शर्मा) ।दशहरे के पर्व पर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की प्रमुख राजयोगिनी बीके मोहिनी दीदी ने कहा कि अपनी ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों पर विजय प्राप्त करना ही सच्ची विजयादशमी मानना है तभी हम दैवीय स्वरूप बनते जायेंगे उन्होंने कहा कि आज प्रवृति में रहते हुए पांच विकार नर में है और पांच विकार नारी में हैं, यह दस विकारों का प्रतीक ही रावण को दस सिर दिखाते हैं और जब एक को काटते हैं, तो दूसरा आ जाता है ऐसे ही मनुष्य जब एक बुराई को छोड़ता है तो दूसरी उस पर हावी हो जाती है,परंतु इन सब का मूल है देह अभिमान जिसको समाप्त करके ही हम इन विकारों पर जीत का सकते हैं। उन्होंने बताया हम हर साल दशहरा मनाते हैं, लेकिन क्या हम वाकई बुराइयों से मुक्त हो रहे हैं, या ये उत्सव बस एक खोखला वार्षिक अनुष्ठान मात्र हैं? जब हम दुनिया पर नज़र डालते हैं, तो पाते हैं कि बुराइयों पर विजय पाने की बजाय, लोग उनके गुलाम बनते जा रहे हैं। बढ़ता भ्रष्टाचार, अनैतिकता और भौतिकवाद एक बढ़ते हुए शून्य का संकेत देते हैं जिसे संपत्ति और भौतिक सुखों से भरने की कोशिश की जा रही है। हमारे जीवन में बुराइयों का बढ़ता प्रभाव अनजाने में दशहरे के लिए बनाए जाने वाले रावण के पुतलों के आकार में झलकता है, जो हर साल बढ़ते जा रहे हैं।
केवल लकड़ी और पुआल के पुतले जलाने से हमें बुराई पर विजय नहीं मिलेगी। यह केवल आध्यात्मिक प्रयास से ही प्राप्त किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि रावण को एक तरफ मूर्ख बताते हैं तो वही उसको पढ़ा लिखा और विद्वान भी बताते हैं साथ यह भी बताते हैं कि वह प्रकृति के पांचो तत्वों को अपने अधीन कर लिया था वास्तव में वर्तमान के मनुष्य कि मनोस्थिति का चित्रण किया गया है।रामायण में वर्णित युद्ध हमारे मन में हमारी उच्चतर आत्मा और हमारी कमज़ोरियों के बीच चल रहे संघर्ष का एक रूपक है। ईश्वर हमें बुराई का प्रतिरोध करने की शक्ति और अपनी वास्तविक पहचान के अज्ञान से उत्पन्न छल-कपट से बचने की बुद्धि देकर इस संघर्ष में हमारी सहायता करते हैं।

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