सिरोही/राजस्थान ।।

सिरोही स्थापना दिवस का भव्य आयोजन,छोड़ गया अनेक सवाल ।

जिला कलेक्टर ने सिरोही स्थापना दिवस को सफल बनाने पर किया धन्यवाद ज्ञापित।

सांसद व विधायको की अनुपस्थिति रही चर्चा का विषय,

(हरीश दवे),

सिरोही के 599 वे सिरोही स्थापना दिवस का तीन दिवसीय सरकारी आयोजन जिला प्रशाषन, पर्यटन विभाग,नगर परिषद व दानदाताओं व जनता की सहभागिता से दूसरी बार भव्यता से आयोजित हुआ जिसमें मनोरंजन से वंचित नगर वासियों व प्रतिभगियों ने जम कर हिस्सा ले कर सफल बनाया।जिसमे दानदाताओं के प्रेरक विधायक संयम लोढा की टीम व जिला कलेक्टर डॉ भंवर लाल,सीईओ डॉ शुभामंगला, एडीएम कालूराम खोड़,एसडीएम सुश्री सीमा खेतान,तहसीलदार सुनीता चारण, तहसीलदार नीरज कुमारी व आयुक्त नगर परिषद महेंद्र सिंह राजपुरोहित ने पूरी ताकत झोंकी जिसका परिणाम रहा की तीनों दिनों तक सिरोही नगर में जश्न का माहौल रहा।

पर 1 नंवम्बर 1956 को भारत संघ गणराज्य में विलीन हुई सिरोही की हिस्ट्री व आजादी के आंदोलन का प्रदर्शनी में शामिल नही करने व सिरोही का राजमहल आम जनता के नही खुलने ओर वहां आयोजित नही करने का नगर वासियों व युवा पीढ़ी को मलाल रहा। राजस्थान का सबसे पिछड़ा जिला सिरोही धार्मिक पर्यटन व अपनी ऐतिहासिक अर्बुदारण्य व चन्द्रावती की विध्वंस हुई संस्कृति के अलावा देश के स्वाधीनता संग्राम में प्रजा मंडल व कोंग्रेस के नेता व संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य गोकुल भाई भट्ट व महान इतिहासकार राय बहादुर की जन्म स्थली के अलावा 6वी से 16 वी सदी तक बने जग विख्यात मन्दिरो की वजह से जग विख्यात है।वर्तमान सिरोही 598 वे वर्ष पूर्व राव सहस्त्रमल ने ईस्वी सन 1425 में की व राव मानसिंह,राव सुरतान,उड़ता अखेराज शूरवीर ओर प्रतापी नरेश हुए मुगलों के दाँत खट्टे किए।राव उम्मेद सिंह व राव शिवसिंह के समय ब्रिटिश हुकूमत का सिरोही में प्रवेश हुआ और आबू की संधि हुई पर अंग्रेजो की गुलामी का सिरोही के अन्य ठिकानो के देवड़ा चौहान रोहुआ,निम्ब्ज,भटाना व अन्य जागीरदारों के अलावा भील, मीणा,गरासियायो ने राव शिवसिंह व राव केसरसिंह के समय विरोध भी जताया व 1905 में “सम्प सभा”बना सन्यासी गोविंद देव ने भील आंदोलन चलाया व 5 मई 1922 से रोहिड़ा में मोतीलाल तेजावत,नव परगना महाजन सभा व सिरोही संदेश के पत्रकार व प्रजा मण्डल नेता पण्डित भीमा शंकर शर्मा ने भील आदिवासी के एकी आंदोलन का नेतृत्व किया इसी तत्कालीन रियासत के दमन चक्र में लीलुडी बरली में जमा हुए आदिवासियों पर ब्रिटिश हुकूमत व रियासत ने डंडे बरसाए,आगजनी हुई,झोपड़े जले व अनेक आदिवासी मौत के घाट उतारे गए पण्डित भीमा शंकर को देश निकाला दे कर सिरोही से दर बदर किया। इस घटना क्रम के बाद कोंग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन के बाद महात्मा गांधी के निर्देश पर सन 1934 में सिरोही राज्य प्रजामण्डल का गठन कर राज्य में उत्तरदायी सरकार के गठन के लिए रियासत व ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष छेड़ा जिनमे उनके सहयोगी रहे वृद्धि शंकर त्रिवेदी,सोभागमल सिंघी,पुखराज सिंघी,ताराचंद दोषी, धर्म चन्द सुराणा,इत्यादि की भूमिका अहम रही व इस आंदोलन को जनता के मिल रहे समर्थन व तिरंगा फहराने के कारण सिरोही रियासत की पुलिस ने आजाद मैदान के निकट जन सभा मे 22 जनवरी को जिला मजिस्ट्रेट अमृत लाल दोषी द्वारा प्रजामण्डल की गतिविधियों को गैर कानूनी करार दिया व पुलिस ने स्वतंत्रता सेनानियों पे डंडे बरसाए डंडे बरसाए।तब सिरोही रियासत बॉम्बे रेजीडेंसी का हिस्सा थी व स गोकुल भाई भट्ट ने महात्मा गांधी के नमक आंदोलन, दांडी यात्रा,असहयोग आंदोलन ,अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया व आजादी के बाद राजस्थान के रजवाड़ों के भारत मे विलय की उनकी प्रमुख भूमिका के अलावा माउंट आबू व दिलवाड़ा गाँव जो गुजरात मे मिलाने में प्रथम गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल आमादा थे उनका गोकुल भाई भट्ट ने 10हजार आदिवासियों के साथ आबु दिलवाड़ा को सिरोही जिले में शामिल करवाया और 1 नवम्बर 1956 को सिरोही जिला भारत संघ गणराज्य में शामिल हुआ व राजमाता व दिवान इच्छा शंकर पण्ड्या व गोकुल भाई भट्ट ने विलय पत्र पर भारत सरकार के साथ हस्ताक्षर किए। अगर गोकुल भाई भट्ट का आंदोलन नही होता तो आबु व प्रख्यात दिलवाड़ा जैन मंदिर सिरोही राजस्थान का हिस्सा नही होतां ।

इसी तरह राजपूताने ,सिरीही व अन्य रजवाड़ों का इतिहास व ताम पत्र,शिलालेख व प्राचीन लिपि के शोध में उनका कार्य बेजोड़ है।पर दुर्भाग्य रहा की गत वर्ष तो स्थापना महोत्सव में उन्हें याद किया गया।लेकिन सिरोही स्थापना दिवस की प्रदर्शनी में सिरोही के सांस्कृतिक वैभव,प्राचीन वैभव,इतिहास व प्रजा मण्डल, आबू विलय की जानकारी सिरोही महोत्सव में न तो जनता को मिली न युवा पीढ़ी को मिली जिसका मलाल नगर वासियों को राज महल नही खुलने पर भी रहा हालांकि जिला प्रशाषन ने पुरी कोशिष का पदम् श्री नरेश रघुवीर सिंह देवड़ा पर कोई असर नही हुआ पर महोत्सव के अंतिम दिन आयोजन में शामिल हुए पूर्व नरेश ने अगले वर्ष सिरोही स्थापना के 600 वे वर्ष में खोलने पर सहमति जताई। जिला कलेक्टर डॉ भंवर लाल ने सिरोही ने तीन दिवसीय समारोह को सफल बनाने में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अपना अमूल्य सहयोग देने वालों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा की आने वाले वर्षो में यह महोत्सव पर्यटन नक्शे पर अपनी एक अलग पहिचान बनाने में कारगर साबित होगा।

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